गुजरात में कल वोटिंग, जानें बीजेपी की ताकत-कमजोरी-अवसर और चुनौतियां – gujarat election bjp congress aam aadmi party swot analysis strength ntck


गुजरात का चुनाव अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंच गया है. एक दिसंबर को पहले चरण की 89 सीटों पर वोटिंग है तो 5 दिसंबर को दूसरे चरण की 93 सीटों पर वोट डाले जाएंगे. 27 साल से लगातार जीत रही बीजेपी अपनी सत्ता को बचाने के लिए संघर्ष कर रही है तो कांग्रेस अपने सियासी वनवास खत्म करने की कवायद में जुटी है. वहीं, चुनावी मुकाबले त्रिकोणीय बनाने की कोशिश में लगी आम आदमी पार्टी पूरे दमखम के साथ मैदान में है. ऐसे में हर तरफ से जीत का आश्वासन है, प्रचंड बहुमत मिलने का अनुमान है, लेकिन असल में सभी पार्टियां कहां खड़ी हैं?

गुजरात चुनाव में राजनीतिक पार्टियों के जीत के दावे को  SWOT ANALYSIS. Strength, Weakness, Opportunity, Threat वाला ये मॉडल से सरल शब्दों में समझा सकता है कि कौन सी पार्टी कहां खड़ी है, किसकी क्या ताकत है और क्या कमजोरी किसी को चुनावी रण में भारी पड़ सकती है. इस चुनाव में क्योंकि सबसे ज्यादा दम बीजेपी, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी द्वारा लगाया गया है तो SWOT ANALYSIS भी इन तीनों का ही किया जाएगा.

बीजेपी का SWOT ANALYSIS

Strength: गुजरात चुनाव में बीजेपी की सबसे बड़ी ताकत हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. वो चेहरा जिसके दम पर चुनाव का माहौल पूरी तरह बदला जा सकता है, जिसके दम पर हारी हुई बाजी को भी अपने पक्ष में किया जा सकता है, बीजेपी के लिए नरेंद्र मोदी के ये मायने हैं. गुजरात क्योंकि नरेंद्र मोदी का गृह राज्य भी है, ऐसे में यहां पर उनकी लोकप्रियता अलग ही स्तर की चलती है. प्रत्याशी कोई भी खड़ा हो, पीएम मोदी के नाम पर बीजेपी के लिए वोट डाल दिए जाते हैं.

अब पीएम मोदी का होना तो बीजेपी के लिए प्लस प्वाइंट है ही, इसके अलावा गृह मंत्री अमित शाह का भी गुजरात से आना स्थिति को और ज्यादा मजबूत करने का काम करता है. बीजेपी के ‘चाणक्य’ माने जाने वाले अमित शाह भी गुजरात की राजनीति से वाकिफ हैं, वे यहां के समीकरण भी समझते हैं और वोटर की पल्स भी. अपने विरोधियों को चुनावी चक्रव्यूह में फंसाना बखूबी जानते हैं.

कहा जाता है कि चुनाव में उस पार्टी की जीतने की संभावना ज्यादा रहती है जिसका जमीन पर संगठन मजबूत हो. इस मामले में भी गुजरात के अंदर बीजेपी की स्थिति मजबूत दिखाई देती है. इतने सालों में बूथ लेवल तक बीजेपी ने एक ऐसा संगठन तैयार कर दिया है कि चुनाव के समय उसके सक्रिय होते ही पार्टी के पक्ष में माहौल बनना शुरू हो जाता है.

बीजेपी पाटीदार समुदाय को इस बार पूरी तरह से साधकर रखे हुए है. बता दें कि 2017 के विधानसभा चुनाव के दौरान हार्दिक पटेल और पाटीदार आरक्षण आंदोलन ने बीजेपी के लिए चुनौती खड़ी कर दी थी, उसकी सीटें 99 पर अटक गई थीं. हालांकि, अब हार्दिक बीजेपी में आ चुके हैं और भूपेंद्र पटेल के रूप में एक पाटीदार समाज का सीएम बनाया गया है. ऐसे में पार्टी अपने इस परंपरागट वोट बैंक को पूरी तरह से जोड़कर रखने की कवायद किया है.  इन मुद्दों के अलावा चुनावी प्रचार में बीजेपी ने फिर हिंदुत्व वाला दांव भी खेलना शुरू कर दिया है, पीएम मोदी ने आतंकवाद का मुद्दा उठाया, जो बीजेपी की सियासी पिच को मजबूती दे सकता है. 

Weakness: बीजेपी की गुजरात में जो सबसे बड़ी ताकत है, वो उसकी एक कमजोरी भी मानी जाती है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरह बीजेपी को गुजरात में कोई दूसरा नेता अभी तक नहीं मिल सका है. 2014 के बाद से गुजरात में तीन मुख्यमंत्री बदले जा चुके हैं. कुछ चुनावी मुद्दे भी ऐसे हैं जो बीजेपी की टेंशन बढ़ा सकते हैं. इसमें महंगाई, बेरोजगारी और स्कूली शिक्षा काफी मायने रखते हैं. इन्हीं मुद्दों के दम पर आम आदमी पार्टी खुद को एक नए विकल्प के तौर पर पेश कर रही है. ऐसे में उस नेरेटिव से पार पाना बीजेपी के लिए एक चुनौती है.

Opportunity: गुजरात का ये चुनाव बीजेपी के लिए अवसर भी लेकर आ रहा है. सबसे बड़ा अवसर तो लगातार सात विधानसभा चुनाव जीतने का रिकॉर्ड बनाना है. उस स्थिति में बीजेपी CPI-M के उस रिकॉर्ड की बराबरी कर लेगी जहां पर लेफ्ट ने बंगाल पर लगातार 34 साल तक राज किया था. इस बार चुनाव में क्योंकि कांग्रेस के अलावा आम आदमी पार्टी और AIMIM जैसी 39 पार्टियां चुनाव लड़ रही हैं. ऐसे में वोटों का बंटवारा बीजेपी के लिए फायदेमंद हो सकता है. 

Threat: बीजेपी के लिए गुजरात चुनाव में सबसे बड़ा खतरा वो बागी बन रहे हैं जिन्हें टिकट नहीं मिला है. करीब एक दर्जन बागी नेता निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं. ऐसे में उनका चुनावी मैदान में उतरना बीजेपी के वोटों में ही सेंधमारी का काम कर सकता है. नाराजगी इस बात को लेकर भी है कि बीजेपी ने कांग्रेस से आए कई दलबदलुओं को टिकट दिया है. ऐसे में कई नेताओं को नाराज किया गया है. अब वो नाराजगी चुनावी नतीजों पर कोई असर ना डले, बीजेपी के लिए ये बड़ी चिंता है.

बीजेपी भले ही न माने कि उसके खिलाफ किसी तरह की एंटी इनकम्बेंसी है, लेकिन गुजरात में 27 साल से उसकी सरकार है. युवा मतदाताओं की एक पूरी पीढ़ी ऐसी है जिसने सिर्फ बीजेपी का राज देखा है. वैसे भी गुजरात में एक ट्रेंड लगातार देखने को मिल रहा है, हर बीतते चुनाव के साथ गुजरात में पार्टी की सीटें कम होती जा रही हैं. पिछली बार तो पार्टी 99 के फेर में फंस गई थी. हाल ही में हुए मोरबी हादसा जिसमें 135 लोगों की जान गई, वो भी बीजेपी के लिए चिंता का सबब बन सकता है. 



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